बड़ा अटपटा सा प्रश्न है ना, "किसका भारत महान?" सभी भारतवासी इसका उत्तर एक सांस में, एक सुर में देते हैं, मेरा भारत महान. परन्तु मेरे इस देश का दुर्भाग्य यही रह गया है कि, मेरे भारत की महानता कुछ और नहीं बस एक कोरा नारा बनकर रह गयी है. प्रत्येक जलसे में, रैलियों में, स्वतंत्रता दिवस पर, गणतंत्र दिवस पर और ऐसे ही कुछ अन्य अवसरों पर 'भारत माता की जय' और 'मेरा भारत महान' जैसे नारे गूंजते रहते हैं. परन्तु वास्तविकता यही है कि इस बात को मानने के लिए कोई तैयार नहीं है. भारत की महानता बस जय-जयकार व शोर की वास्तु बनकर रह गयी है. ऐसी महानता पर किसको नाज़ होगा? हम मुंह से तो भारत को महान कहने में नहीं झिझकते परन्तु ह्रदय से मानते भी नही हैं.
आज का छात्र विदेश में जाकर पढने व कमाने का सपना आँखों में पाल कर बड़ा होता है. मौका मिलते ही प्रत्येक छात्र विदेश जाकर बस जाने को तैयार है. हमारे इंजिनियर व डॉक्टर कहते हैं कि भारत में वो सुविधा उपलब्ध नहीं है जो विदेशों में है. भारत में आगे बढ़ने के अवसर नहीं हैं. भारत में पैसा नहीं है. फिर भारत किस प्रकार महान है? क्या भारत ऐसे सपूतों को जनकर ही महान हो गया जो मौका मिलते ही पीठ दिखाकर भाग जाने को तैयार हैं? क्या भारत इसलिए महान है कि उसके वीर सपूत इतने धन-लोलुप व सुविधा प्रेमी हो गए हैं कि वे भारत में कष्ट सहन नहीं कर सकते हैं. आज की युवा पीढ़ी धनार्जन को ही शिक्षा का उद्देश्य व लक्ष्य मानती है. इस प्रकार धनार्जन करने के लिए उन्हें जहाँ बेहतर अवसर मिलेंगे वे वहीँ भाग जायेंगे.
यही हाल पूरे भारतवर्ष में है. चाहे वह आम जनता हो, नेतागण हों, छात्र हों या सरकारी कर्मचारी, सभी ने भारत को महान कहना अपना कर्त्तव्य समझ लिया है, वे लोग अर्थात सभी भारतवासी यह भूल जाते हैं कि भारत तभी महान हो सकता है जब उसके देशवासी महान होंगे. उनको सर्वप्रथम स्वयं के अन्दर झाँककर यह देखना चाहिए कि क्या वो महान हैं? यदि हैं तो जोर से, खुले दिल से कहें,"मेरा भारत महान" अन्यथा यह कहना ही छोड़ दें कि "मेरा भारत महान". महानता का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आप सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हों, पूरा देश आपको जाने-पहचाने या आपकी जय-जयकार करे. महानता तो सदाचारों से आती है. अच्छा आचार-व्यवहार, कर्म के प्रति ईमानदारी ही आपको महान बनाती है. महानता शब्द कोई ऐसा शब्द नहीं है जिसका प्रयोग सभी के लिए किया जाये. इसलिए इसका प्रयोग उसी के लिए किया जाना चाहिए जो इसका हकदार हो.
आज भी मुझे किसी व्यंग्यकार की पंक्तियाँ याद आती हैं,
"मेरा भारत महान, सौ में से निन्यानवे बेईमान"
यह पंक्तियाँ कुछ और नहीं अमुक व्यंग्यकार की मनोदशा को प्रदर्शित करती हैं. उसके मन में संदेह है कि भारत महान है अथवा नहीं. उक्त टिपण्णी कर के व्यंग्यकार ने अपना मत स्पष्ट किया है कि वर्तमान भारत महानता कि श्रेणी में कतई नहीं आता क्योंकि यहाँ भ्रष्टाचार की अधिकता है.इसी प्रकार हमारे राजनीतिज्ञों का भारत भी जनसभा को संबोधित करते समय, राष्ट्रीय पर्व पर अथवा भाषण देते समय ही महान रहता है किन्तु मंच से उतरते ही उनका भारत महान नहीं रह जाता है. हमारे देश की आम जनता का भारत भी विशेष परिस्थितियों में ही महान रहता है. तब प्रश्न पुनः उठता है कि " किसका भारत महान?" छात्र तो मानना ही नहीं चाहता क्योंकि उसकी रूचि विदेश में है, नेतागण भी नहीं, आम जनता भी नहीं, फिर आखिर किसका भारत महान है? बुलंद आवाज़ में, सुर में सुर मिलकर सभी का भारत महान है किन्तु अकेले में सभी इस भारत से ऊब गए हैं. यहाँ बदहाली, कंगाली के सिवा कुछ नहीं है.
छात्र का भारत विद्यालय में, राष्ट्रीय पर्व पर, नेता का मंच पर, लेखक का पुस्तकों व पुरस्कार वितरण के समय, अभिनेता का फिल्मों में, जनता का विशेष परिस्थितियों में भारत महान होता है. ऐसे में भारत की महानता अधर में है. जब हमारे देश के लोग ही तथ्य को मानने को तैयार नहीं हैं कि मेरा भारत महान तो फिर और कौन मानेगा? भारत को महान अथवा निम्न कहने से पूर्व हमें स्वयं को देखना होगा कि क्या हम महान हैं? क्या हमारा आचरण महान कहलाने लायक है? हमारा भारतवर्ष प्राचीन काल में महान था क्योंकि हमारे पूर्वज महान थे. यदि आज हमारे आचरण से हमारे देश कि महानता पर संदेह हो रहा है तो हमें भारतवासी कहलाने का कोई अधिकार नहीं है. हमें अधिकार है तो बस महान से महानतम बनाने का. इसके लिए हमें स्वयं का आचरण सही करना होगा. यदि हम सदाचारी होने के पश्चात स्वयं को महान समझेंगे तब केवल मुख से नहीं वरन दिल से कहेंगे, " मेरा भारत महान" और कोई दोबारा यह पूछने का साहस भी नहीं कर पायेगा कि " किसका भारत महान?"
Wednesday, May 12, 2010
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