Tuesday, May 11, 2010

भ्रष्टाचार की चौतरफा बयार

आज का युग वैज्ञानिक युग है. विज्ञान ने ही रफ़्तार को जन्म दिया है. इसी का अनुकरण आज के युग का प्रत्येक मनुष्य कर रहा है. आज के इस युग में सतत चलायमान रहने का नाम ही जीवन है. इस युग में किसी भी व्यक्ति के पास पीछे मुड कर भी देखने की फुरसत नहीं है. कछुए की चाल से चलने वाले लोगों को आज के युग में निकम्मा और आलसी कहा जाता है. आज के युग में सभी को खरगोश की तरह तेज भागने की आदत सी हो गयी है परन्तु सो जाने की छूट नहीं है.


आज के समय में प्रत्येक व्यक्ति जल्दी से जल्दी अमीर बनना चाहता है. धन कमाना चाहता है, वह भी अकूत धन. धन कमाने का रास्ता कैसा भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता. हसरत है बस धन की.वह भी इतना जिससे वह सभी ऐश-ओ-आराम के सामान जुटा ले और उसके पश्चात इतना बचा भी ले कि कम से कम उसके बच्चों को तो कोई तकलीफ न हो.पहले के लोग तो उतने धन से ही संतुष्ट थे जिससे वह भली प्रकार गुजर-बसर कर ले, परन्तु अब तो धन कमाने कि एक अंधी होड़ सी लगी है. एक हद तक इसमें कोई बुराई भी नहीं है, परन्तु धन कमाने का रास्ता ठीक होना चाहिए.परन्तु आज के लोगों कि अवधारणा है कि उचित मार्ग से धन इकठ्ठा ही नहीं किया जा सकता. ऐसे लोगों को देखकर मुझे भ्रम हो जाता है के जैसे ईश्वर ने उन्हें मरने के बाद अपने साथ अपनी कमाई लाने की छूट दे राखी है. आज चारों ओर धन कमाने की इस अंधी होड़ ने भ्रष्टाचार को जन्म दे दिया है.


आज चारो ओर भ्रह्ताचार का बोल-बाला है. शायद ही आज कोई ऐसा क्षेत्र मिले जो भ्रष्टाचारमुक्त हो. सर्वप्रथम हमारे देश की कमान जिन महानुभावों के हाथों में है वे ही सर्वाधिक भ्रष्ट हैं. प्राचीन काल के नेता जनसेवा हेतु राजनीति के क्षेत्र में आते थे, आज के नेता धन कमाने के लिए राजनीति में पदार्पण करते हैं. सरकारी कर्मचारियों का हाल तो बताने लायक ही नहीं है. जब तक उनके सिर पर चांदी का जूता न मारा जाये तब तक फाइलें उनकी मेजों से सरकती तक नहीं हैं. न्यायपालिका के क्षेत्र में तो वकीलों ने सरे-आम हमारे संविधान की इज्जत उछाल दी है. दोषी, जिनकी असल जगह सलाखों के पीछे होनी चाहिए, वे ठाठ से बहार घूम रहे हैं, अपने काबिल वकील साहब की मेहेरबानी पर.


कुछ समय पूर्व मुझसे मेरे मित्र ने पुछा कि भ्रष्टाचार मुक्त कोई क्षेत्र बताओ. मैंने तपाक से उससे कहा, सेना व सिक्षा. परन्तु मुझे अब लगता है कि मैं वहां पर बिल्कुल गलत था. शायद मैंने इन क्षेत्रों के नाम बता कर अपनी अल्पज्ञता का परिचय दिया था. हमारे वीर सैनिक युद्ध के समय अपने प्राणों कि आहुति तक दे देते हैं. परन्तु क्या सभी सैनिक ऐसे ही हैं? आखिर ये युद्ध कि स्थिति आती कैसे है? आज चारों ओर आतंक फैला है. आतंकवादी आते हैं, भरे बाजारों में, मंदिरों में, ट्रेनों में या कहिये किसी भी स्थान पर, जहाँ उनकी इच्छा होती है, धमाका करते हैं और फरार. क्या वे आतंकवादी बिना हमारी सीमा पार किये आते हैं? निगरानी करने में भी तो यही सैनिक होते हैं.तब क्या ये हमारे रणबांकुरे सो रहे होते हैं? हम हर आतंकवादी हमले के पश्चात पकिस्तान को दोष देना शुरू कर देते हैं. सब लोग बताने लगते हैं कि वह पाकिस्तानी आतंकवादी था, फलानी जगह उसने प्रशिक्षण लिया था, अमुक दल से वह जुड़ा हुआ है, या कुछ और. लेकिन जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो क्या पकिस्तान पर ही सारा दोष डाल देना सही है? हम ये क्यों नहीं जान पाते हैं कि आखिर वो हमारी सीमा पार करके कैसे आये? इतने जवान सीमा पर तैनात रहते हैं, सेना के पास अपना ख़ुफ़िया विभाग है, जो कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस है, फिर दिक्कत क्या आती है? ऐसे में आप ही तय करिए कि भारत पर हो रहे आतंकी हमले के अकेला दोषी पाकिस्तान ही है क्या? इन सब कामों में निश्चित रूप से हमारे कुछ लोग मिले हुए होते हैं.


शिक्षा के क्षेत्र का जो हाल है, उसे कहते हुए भी शर्म आती है. आज का शिक्षक अपनी मर्यादा बेंच कर धन कामने की अभिलाषा रखता है. निजी विद्यालय तो धन कमाने का जरिया बन गए हैं, और सरकारी विद्यालय तो अवकाशों का गढ़. सरकारी विद्यालयों के शिक्षकों की आरामतलबी बताने में मेरा सिर शर्म से झुक जाता है. जो मस्तक इन पूजनीय लोगों के समक्ष सम्मान से झुकना चाहिए वह शर्म से झुकता है, यह स्तिथि स्वयं ही भ्रष्टाचार की गाथा बताने के लिए काफी है.


आज के समय में यदि सर्वाधिक भ्रष्ट लोगों की बात की जाये तो हमारे देश के तथाकथित कर्णधार अर्थात हमारे नेता चोटी पर दिखाई देते हैं. नेताओं के पश्चात वकील, पुलीस व सरकारी कर्मचारी आते हैं. यह अभी तक गनीमत है की शिक्षा और सेना अभी तक इतने भ्रष्ट नहीं हैं कि इन लोगों के प्रतिभागी बन सकें. धन और पद के नशे में चूर हमारे नेता केवल धर्म के नाम पर राजनीती करते दिखाई देते हैं. वह भी कोरी राजनीति वास्तविक भला वह भी नहीं.


आज के समाचार पत्र इन्हीं नेताओं के कुकर्मों से भरे रहते हैं. आज के इस युग में भ्रष्ट लोगो की संख्या मत पूछिए, बस भ्रष्ट्राचार से दूर रहने वालों का नाम अपनी अंगुलिओं पर गिन लीजिये, यदि नाम कम पड़ जाएँ तो भी आश्चर्य मत कीजियेगा. हमारे देश को आज़ाद कराने में उस समय के खद्दरधारी नेताओं का जितना योगदान रहा है, उतना ही योगदान आज के खद्दरधारियों ने देश की ऐसी स्तिथि बनाने में दिया है. तमाम घोटालों में इनके नाम आते हैं, जांच के लिए आयोग बनते हैं, फिर सब कुछ भुला दिया जाता है. आज-कल देश में नेताओं पर न जाने कितने मुक़दमे लंबित होंगे, फिर वे ही देश के कर्णधार हैं..........


सरकारी कर्मचारी तो रिश्वत लेना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझते हैं. वे तो इस प्रकार रिश्वत लेते हैं जैसे वह उनका मौलिक अधिकार हो. कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे सरकरी नौकरी मिलने के पश्चात उन्हें रिश्वत ऐंठने का ठेका मिल गया हो. उनकी अवधारणा है कि, जब सभी, ऊपर से लेकर नीचे तक लेते हैं तो हम ही क्यों पीछे रहें? हम ही क्यों साधू बने रहें? रिश्वत न मिलने पर ये तो ऐसे रूठ जाते हैं जैसे इनके मौलिक अधिकारों का हनन किया जा रहा हो.


इस प्रकार कि भ्रष्टाचार की आंधी में फिर वही गरीब-दुखिया, भारत की जनता. आखिर मंहगाई की मार इन्हें ही झेलनी है, रिश्वत इन्हीं की जेबों से जानी है. ऐसे भ्रष्ट माहौल में देश का भविष्य क्या होगा, ईश्वर ही जाने?


यदि वास्तव में देश को समृद्ध बनाना है, देश का चौतरफा विकास करना है तो सर्वप्रथम देश में चल रही इस भ्रष्टाचार की आंधी को रोकना होगा. नेताओं को अपने चरित्र में सुधार करना होगा. आज मुझे लगता है कि यदि हमारे संविधान निर्माताओं ने प्रधानमन्त्री को एकाधिकार न देकर कुछ अधिकार राष्ट्रपति को भी दिए होते तो बेहतर होता. परन्तु जो नहीं है उस पर खेद व्यक्त करने से कोई लाभ नहीं है, जो है उसी को बेहतर बनाना होगा. स्वयं ही यह समझना होगा कि हमें भ्रष्टाचार में नहीं लिप्त होना है. यदि ऐसी भावना लोगो के मन में आएगी तो ही भ्रष्टाचार समाप्त हो सकता है. भ्रष्टाचार समाप्त होने के बाद ही हम एक सही दिशा में बढ़ पाएंगे.






"  सुलग रही है माँ भारती,
   भ्रष्टाचार की आग में.
   दूर करो उसकी इस पीड़ा को,
   मिलेंगी खुशियाँ सौगात में."

No comments:

Post a Comment