Friday, April 16, 2010

दे दो वरदान

                                                        दे दो वरदान   

हो ज्वालामुखी मेरा शरीर,
आँखों से फूटे लावा न कि नीर.
भस्म कर सके भ्रष्टाचार हो ऐसी आग,
तब सोंचूंगा  पूरा किया ऋण का अपना भाग.

एक-एक आंसू मेरे प्रलय मचा सकें,
एक-एक शब्द मेरे क्रांति ला सकें.
जब मैं कर सकूंगा ऐसा आह्वान,
तभी मेरा देश बनेगा पुनः महान.

अभी हैं साथी मेरे सोये हुए मादकता में,
भटक गए हैं राहों से पाश्चात्य कि चकाचौंध  में.
फूँक सकूँ आग क्रांति कि, ये वरदान,
तभी होगा मेरे भारत का नया विहान.

भ्रष्ट्राचार का नाग कुंडली मारे बैठा है,
धन मद में डूबा हर कोई ऐंठा है.
कर सकूँ उसको वश में दो मुझको ऐसी बीन,
तभी होगा मेरे देश का इतिहास नवीन.

भ्रष्ट राजनीती कि आग में जल रहा मेरा देश,
पाखंडी बन गए महात्मा बदल कर अपने भेष.
दे दो मुझको वरुण का वह रूप विकराल,
बना सकूँ अपने देश को रमणीय तरण ताल.

चहुँ ओर फैला है अशिक्षा का अन्धकार,
अंधों में काने राजाओं कि हो रही जय-जय कार.
मेरी कलम में दे दो इतनी ज्योति,
तभी चमकेगा मेरे देश का भाग्य जैसे जग-मग हीरे-मोती.

मेरे देश कि सुप्त अलसी युवा पीढ़ी,
सफलता पाने में धन को बना रही सीढ़ी.
दे दो बिगुल जिससे छेद सकूँ क्रांति का राग,
ताभिपुनाह चमकेगा मेरे देश का भाग्य.

हर तरफ आंधियां नफरत कि चल रहीं,
चालें सियासत कि इन्हें बढा रहीं.
बना दो मुझे हिमालय, रोक सकूँ इनकी रफ़्तार,
तभी बहेगी मेरे भारत में पुनः प्रेम कि बयार.

गुजराती, बंगाली, मराठी हैं भारतवासी नहीं है कोई,
ऐसे अखंड भारत का क्या करेगा कोई ?
दे दो मुझे   ऐसा वरदान, दे सकूँ इन्हें अखंडता का ज्ञान,
तभी लहराएगा पुनः मेरे भारत कि अखंडता का निशान .

दे दो मुझको ऐसा वरदान, कर सकूँ पूरा अपना आह्वान,
कुछ और नहीं,बस यही आकांक्षा है मन में,
जब तक जियूं इसी मिट्टी के लिए,
फिर कर दूँ स्वयं को समर्पित इसी मिट्टी में.

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