Monday, April 12, 2010

रेजीडेंसी का दर्द

                                                           रेजीडेंसी का दर्द            




            क्या आपने किसी इमारत को बोलते हुए सुना है ? आप भी सोंच रहे होंगे कि भला इमारतें भी बोलती हैं , ये भी कैसी बातें करने लगा ? ईंट और गारे कि बनी निर्जीव इमारतें भी अगर बोलने लगीं तो हो चूका इस संसार में हम मनुष्यों को गुजरा. लेकिन ध्यान से सुनिए, हृदय से महसूस करिए  तब आपको एहसास होगा कि ये भी बोलती हैं. हमारे कार्यों से इन्हें भी दुःख होता है, दर्द होता है. मैंने एक बोलती हुई इमारत को सुना है, उसका दर्द जाना है. क्या आप भी उसके बारे में जानना चाहेंगे?
          
           लखनऊ का हर एक व्यक्ति रेजीडेंसी के बारे में जनता ही होगा, और जो नहीं जनता उसे भारत के प्रथम  स्वतंत्रता संग्राम के इस चश्मदीद गवाह के बारे में जरूर जानना चाहिए. आप अंदाजा लगाने लगे होंगे कि इसे क्या दर्द हो सकता है , क्या तकलीफ हो सकती है इसे? मैं आपको अभी से बता देना चाहता हूँ कि इसे न तो इस बात का दर्द है कि लोग इसे भूल रहे हैं और न ही इस बात का मलाल है कि सरकार इसकी मरम्मत और रख-रखाव पर कम ध्यान दे रही है. इसका दर्द आज कि युवा पीढ़ी से है. ऐसी युवा पीढ़ी जो पाश्चात्य सभ्यता भौतिकवादी गुणों पर इतनी आसक्ति रखती है कि उसे भारतीय सभ्यता बेमानी सी लगने लगती है.
         
           आज-कल हमारे स्वतंत्रता संग्राम कि यह मूक धरोहर अपने अहाते में प्रेमी-युगलों के झुरमुट से खासा असहज महसूस करता है और आहात है. एक दुसरे कि बाहों में बाहें डाले वे प्रेम कि पींगे बढ़ने में जुटे रहते हैं. एक दुसरे के प्त्रेम में वे इस कदर खो जाया करते हैं कि उन्हें लोक-लाज कि कोई सुध नहीं रहती. ऐसे द्रश्यों को देख कर इस बूढ़े इंकलाबी कि आँखें शर्म से झुक जाती हैं.
        
           लखनऊ, नजाकत का शहर,जहाँ पर हया और नफासत का बोल-बाला हुआ करता था. अब यहाँ कि युवा पीढ़ी को पाश्चात्य विचारधारा ने अपने चंगुल में ले लिया है. तो ये नजाकत, नफासत और हया से कोसों दूर हो गए हैं और सभी को अपनी मोहोब्बत का नंगा नाच दिखने को आतुर हैं. रेजीडेंसी को दर्द है कि कभी-कभी उन्माद में ये जोड़े उसकी दीवारों पर अपने नाम तक उकेर दिया करते हैं. रेजीडेंसी कहती है कि ," मैं इंकलाबी हूँ , मेरी दीवारों ने बहुत सी  गोलियां  झेली हैं, अब मेरी उम्र के इस पड़ाव  पर मेरी दीवारों को प्यार का पोस्टर मत बनाओ ."
        
           आप खुद सोंचिये, रेजीडेंसी जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम से जुडी एक महत्त्वपूर्ण इमारत है, हमारी राष्ट्रीय धरोहर है , उसमें यह क्या हो रहा है ? क्या यह ठीक है? अब रेजीडेंसी कि पहचान बदली जा रही है. जो अब तक स्वतंत्रता संग्राम कि पहचान थी, धीरे-धीरे प्रेम-केंद्र के रूप में परिवर्तित होती जा रही है.
          
           रेजीडेंसी को इसी  बात का दुःख है. मैंने इस दर्द को महसूस किया है. क्या आपको भी लगता है कि यह गलत हो रहा है . यदि हाँ तो प्रयास करिए कि इस प्रकार कि इमारतों के दर्द को दूर किया जाये. ये हमारी रह्त्रिया धरोहर हैं , हमें इनका सम्मान करना चाहिए...............

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