Saturday, April 17, 2010

मतदान

                                                        मतदान

चुनकर जिनको संसद भेजा हमने,
दिखाए थे जिन्होंने प्रगति के सपने.
किया था वादा जिन्होंने दुःख हरने का,
हम सभी के कव्ष्टों को कम करने का.
कहा था हम कम करेंगे बेरोज़गारी,
दूर करेंगे जनता कि लाचारी.
कहा था दो हमारे पक्ष में अपना मतदान,
हम करेंगे तुम्हारी समस्याओं का समाधान.
वही नेता अब शकल नहीं  दिखाते हैं,
बंद गाडिओं में बैठ निकल जाते हैं.
अब कर रहे, बैठ, दिल्ली में मज़ा,
बाकि जनता काट रही सजा.
अपनी करनी पर पछता रही,
सौ-सौ आंसू रोज़ बहा रही.
अपने मत का किया अनुचित प्रयोग,
अब पाच बरस कि रहे यातना भोग.
ऐसी ही है मेरे देश कि भोली जनता,
जिसको लूट लेते, बहला-फुसला नेता.
बार-बार ठोकर खाई इसने,
अपने अधिकारों को न समझा इसने.
कब जानेंगे ये अच्छा-बुरा?
कौन अच्छा, कौन मसखरा ?
कब जागेंगे ये अपनी चिर निद्रा से?
कब मुक्त होंगे ये अपनी तन्द्रा से?

क्या समझाए इनको कौन?
जब स्वस्तिथि पर हैं ये मौन.

जब तोड़ेंगे जाती-पांत के बंधन को,
तभी अपनी ताकत को पहचानेंगे.
तभी कहेंगे ये ललकार,
हमारे भारत पर हमारी सरकार.

Friday, April 16, 2010

दे दो वरदान

                                                        दे दो वरदान   

हो ज्वालामुखी मेरा शरीर,
आँखों से फूटे लावा न कि नीर.
भस्म कर सके भ्रष्टाचार हो ऐसी आग,
तब सोंचूंगा  पूरा किया ऋण का अपना भाग.

एक-एक आंसू मेरे प्रलय मचा सकें,
एक-एक शब्द मेरे क्रांति ला सकें.
जब मैं कर सकूंगा ऐसा आह्वान,
तभी मेरा देश बनेगा पुनः महान.

अभी हैं साथी मेरे सोये हुए मादकता में,
भटक गए हैं राहों से पाश्चात्य कि चकाचौंध  में.
फूँक सकूँ आग क्रांति कि, ये वरदान,
तभी होगा मेरे भारत का नया विहान.

भ्रष्ट्राचार का नाग कुंडली मारे बैठा है,
धन मद में डूबा हर कोई ऐंठा है.
कर सकूँ उसको वश में दो मुझको ऐसी बीन,
तभी होगा मेरे देश का इतिहास नवीन.

भ्रष्ट राजनीती कि आग में जल रहा मेरा देश,
पाखंडी बन गए महात्मा बदल कर अपने भेष.
दे दो मुझको वरुण का वह रूप विकराल,
बना सकूँ अपने देश को रमणीय तरण ताल.

चहुँ ओर फैला है अशिक्षा का अन्धकार,
अंधों में काने राजाओं कि हो रही जय-जय कार.
मेरी कलम में दे दो इतनी ज्योति,
तभी चमकेगा मेरे देश का भाग्य जैसे जग-मग हीरे-मोती.

मेरे देश कि सुप्त अलसी युवा पीढ़ी,
सफलता पाने में धन को बना रही सीढ़ी.
दे दो बिगुल जिससे छेद सकूँ क्रांति का राग,
ताभिपुनाह चमकेगा मेरे देश का भाग्य.

हर तरफ आंधियां नफरत कि चल रहीं,
चालें सियासत कि इन्हें बढा रहीं.
बना दो मुझे हिमालय, रोक सकूँ इनकी रफ़्तार,
तभी बहेगी मेरे भारत में पुनः प्रेम कि बयार.

गुजराती, बंगाली, मराठी हैं भारतवासी नहीं है कोई,
ऐसे अखंड भारत का क्या करेगा कोई ?
दे दो मुझे   ऐसा वरदान, दे सकूँ इन्हें अखंडता का ज्ञान,
तभी लहराएगा पुनः मेरे भारत कि अखंडता का निशान .

दे दो मुझको ऐसा वरदान, कर सकूँ पूरा अपना आह्वान,
कुछ और नहीं,बस यही आकांक्षा है मन में,
जब तक जियूं इसी मिट्टी के लिए,
फिर कर दूँ स्वयं को समर्पित इसी मिट्टी में.

Monday, April 12, 2010

रेजीडेंसी का दर्द

                                                           रेजीडेंसी का दर्द            




            क्या आपने किसी इमारत को बोलते हुए सुना है ? आप भी सोंच रहे होंगे कि भला इमारतें भी बोलती हैं , ये भी कैसी बातें करने लगा ? ईंट और गारे कि बनी निर्जीव इमारतें भी अगर बोलने लगीं तो हो चूका इस संसार में हम मनुष्यों को गुजरा. लेकिन ध्यान से सुनिए, हृदय से महसूस करिए  तब आपको एहसास होगा कि ये भी बोलती हैं. हमारे कार्यों से इन्हें भी दुःख होता है, दर्द होता है. मैंने एक बोलती हुई इमारत को सुना है, उसका दर्द जाना है. क्या आप भी उसके बारे में जानना चाहेंगे?
          
           लखनऊ का हर एक व्यक्ति रेजीडेंसी के बारे में जनता ही होगा, और जो नहीं जनता उसे भारत के प्रथम  स्वतंत्रता संग्राम के इस चश्मदीद गवाह के बारे में जरूर जानना चाहिए. आप अंदाजा लगाने लगे होंगे कि इसे क्या दर्द हो सकता है , क्या तकलीफ हो सकती है इसे? मैं आपको अभी से बता देना चाहता हूँ कि इसे न तो इस बात का दर्द है कि लोग इसे भूल रहे हैं और न ही इस बात का मलाल है कि सरकार इसकी मरम्मत और रख-रखाव पर कम ध्यान दे रही है. इसका दर्द आज कि युवा पीढ़ी से है. ऐसी युवा पीढ़ी जो पाश्चात्य सभ्यता भौतिकवादी गुणों पर इतनी आसक्ति रखती है कि उसे भारतीय सभ्यता बेमानी सी लगने लगती है.
         
           आज-कल हमारे स्वतंत्रता संग्राम कि यह मूक धरोहर अपने अहाते में प्रेमी-युगलों के झुरमुट से खासा असहज महसूस करता है और आहात है. एक दुसरे कि बाहों में बाहें डाले वे प्रेम कि पींगे बढ़ने में जुटे रहते हैं. एक दुसरे के प्त्रेम में वे इस कदर खो जाया करते हैं कि उन्हें लोक-लाज कि कोई सुध नहीं रहती. ऐसे द्रश्यों को देख कर इस बूढ़े इंकलाबी कि आँखें शर्म से झुक जाती हैं.
        
           लखनऊ, नजाकत का शहर,जहाँ पर हया और नफासत का बोल-बाला हुआ करता था. अब यहाँ कि युवा पीढ़ी को पाश्चात्य विचारधारा ने अपने चंगुल में ले लिया है. तो ये नजाकत, नफासत और हया से कोसों दूर हो गए हैं और सभी को अपनी मोहोब्बत का नंगा नाच दिखने को आतुर हैं. रेजीडेंसी को दर्द है कि कभी-कभी उन्माद में ये जोड़े उसकी दीवारों पर अपने नाम तक उकेर दिया करते हैं. रेजीडेंसी कहती है कि ," मैं इंकलाबी हूँ , मेरी दीवारों ने बहुत सी  गोलियां  झेली हैं, अब मेरी उम्र के इस पड़ाव  पर मेरी दीवारों को प्यार का पोस्टर मत बनाओ ."
        
           आप खुद सोंचिये, रेजीडेंसी जो हमारे स्वतंत्रता संग्राम से जुडी एक महत्त्वपूर्ण इमारत है, हमारी राष्ट्रीय धरोहर है , उसमें यह क्या हो रहा है ? क्या यह ठीक है? अब रेजीडेंसी कि पहचान बदली जा रही है. जो अब तक स्वतंत्रता संग्राम कि पहचान थी, धीरे-धीरे प्रेम-केंद्र के रूप में परिवर्तित होती जा रही है.
          
           रेजीडेंसी को इसी  बात का दुःख है. मैंने इस दर्द को महसूस किया है. क्या आपको भी लगता है कि यह गलत हो रहा है . यदि हाँ तो प्रयास करिए कि इस प्रकार कि इमारतों के दर्द को दूर किया जाये. ये हमारी रह्त्रिया धरोहर हैं , हमें इनका सम्मान करना चाहिए...............