Monday, August 9, 2010

कुछ ख़ास है यह "नौ"

यूँ तो आज़ादी के दीवानों के लिए स्वतंत्रता संग्राम कि हर तारिख उतनी ही पाक और पवित्र है. जंग-ए-आज़ादी के हर दिन को इन दीवानों ने अपनी शहादत का दिन माना और कुर्बानियां दीं. इतिहास की तारीखों पर गौर करने पर हमें मालूम होगा कि जितना पवित्र अगस्त का महीना है उतना और कोई नहीं. और अगर बात की जाये तारीखों कि तो ९ अगस्त अपनी एक ख़ास अहमियत रखती है. इसी दिन तीन-तीन ऐसी घटनाएँ घटीं जो स्वतंत्रता के समर में मील का पत्थर साबित हुईं. इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में दर्ज ये तारीखें हमें फक्र करने का मौका देती हैं.
१.) ९ अगस्त १८९७, ये वो तारिख है, जिस दिन दामोदर चापेकर को गिरफ्तार किया गया था. यह वही दामोदर चापेकर हैं जिनको जंग-ए-आज़ादी में पहला क्रांतिकारी शहीद होने का गौरव प्राप्त है. इन्होंने पुणे के प्लागुए कमिश्नर रैंड कि हत्या अपने दो भाइयों के साथ मिलकर की थी. हत्या २२ जून १८९७ को हुई थी और इसमें भाई बाल कृष्ण चापेकात्र और वासुदेव चापेकर भी भागिदार थे.
२.) ९ अगस्त १९२५, काकोरी कांड. ८ डाउन ट्रेन को काकोरी में लूट कर क्रन्तिकरिओन ने लूट कर बर्तानिया हुकूमत कि नींद उदा दी थी. इस लूट से जहाँ क्रांतिकारियों को धन मिला वहीँ अंग्रेजों को सबक कि क्रांतिकारी केवल बोलना ही नहीं जानते, अपनी बातों को अंजाम देने का माद्दा भी रखते हैं.
३.) ९ अगस्त १९४२, स्वतंत्रता संग्राम का आखिरी और निर्णायक आन्दोलन "भारत छोड़ो आन्दोलन" की शुरुवात ग्वालीयर टेंट मैदान से हुई. इस आन्दोलन में भारतीय एकजुट होकर अंग्रेजों के खिलाफ खड़े हुए और उन्हें भागने पर मजबूर कर दिया.

इससे तो हम यही कह सकते हैं कि आखिर यह ९ यानी, ९ अगस्त वाकई कुछ ख़ास है.